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दिनांक: 05-Jul-2018, Thursday ,Hoshangabad

फर्जी किराये नामे पर चल रहे हैं आगनबाड़ी केन्द्र

नहीं है खुद के नाम जमीन, न है खुद का मकान फिर भी आंगनबाड़ी संचालन के लिए विभाग को दिया किराएं पर

संतराम निषरेले

श्रीप्रभात टाईम्स होशंगाबाद। दरअसल बात ग्रामीण क्षेत्र की नहीं हैं कि हम कहें कि जिस मकान में हम रह रहें है उसकी रजिस्ट्री नहीं है या कहें कि यह तो हमारे दादा-परदादा की जमीन है ऐसा अक्सर ग्रामीण क्षेत्रों में अधिक देखने को मिलता है । लेकिन हम बात कर रहें है शहरी क्षेत्र की जिसके पास न खुद की जमीन है न खुद का मकान है। खुद नजूल की जमीन पर बनाएं अतिक्रमण कर बनाएं मकान पर रह रहे है जिसका विभाग ने न तो पट्टा दिया है न अतिक्रमणकारी के पास रजिस्ट्री है। उसी में टीन सेट बनाया है जिसकी माप महिला बाल विकास द्वारा निर्धारित मापदंड पूरे नहीं कर पा रहा है इसके बावजूद भी विभाग ने अपनी आंखों पर पट्टी बांधकर मकान को किराएं पर ले रखा है। वहीं न तो बच्चों के लिये खेल कूद की जगह है न अलग से शौचालय है न किसी प्रकार की सुविधा है । फिर भी विभाग ने किराये के लिये चुना है । इसमें विभाग की मिली भगत सामने आ रहें हैं ।

नहीं हो रहा शर्तों का पालन

महिला एवं बाल विकास अधिकारी यदि पूरे शहर और ग्रामीण क्षेत्रों में ईमानदारी से पूरा सर्वे करें तो जितनी आंगनबाड़ी किराये से चल रही है उसमें अधिकतर फर्जी किराएनामें का उपयोग किया गया हैं। किराये के लिये जो विभाग ने नियम शर्ते निर्धारित की है उसमें से शायद ही कोई पालन कर रहा होगा। इसमें अधिकतर तो अपने आंगनबाडी कार्यकर्ता के घर में संचालित है या किसी जगह सहायिका के घर में  किराये से संचालित हो रही जिसके कारण आम जनता का कहना है कि जो सुविधा महिला एवं बाल विकास मुहिया कराता है उसमें से अधिकतम आंगनबाडी कार्यकर्ता या सहायिका तक ही सीमित रह जाती है। कुछ आंगनबाड़ी में जो खाना बच्चों के लिये दिया जाता है वह भी आंगनबाड़ी कार्यकर्ता और उनके रिश्तेदारों के घर पहुंचाया जाता हैं।

नहीं होता औचक केन्द्र निरीक्षक

आंगनबाड़ी केन्द और मिनी आंगनबाड़ी केन्द्र के आस पास रह रहें लोगो से जब हमें पूछा कि क्या महिला बाल विकास से कोई अधिकारी चैक करने आता है तो अधिकतर जबाव था नहीं। कुछ केंद्रो पर यदि जांच के नाम पर जाते है तो केन्द्र के अंदर बैठ कर चाय नास्ता करके चलते बनते है। कुछ केंद्रों के आस पास रहने वाले नागरिकों का कहना है कि जिस दिन महिला बाल विकास से कोई अधिकारी आने वाला होता है उस दिन सहायिका घर घर जाकर बच्चों को समझा बुझा कर तैयार करके केन्द्र में बिठाएं रखती है जब तक कि खाना पूर्ति न हो जाएं। बाकी दिन बच्चों को अपन ध्यान खुद ही रखना पढ़ता है। इस प्रकार संचालित केन्द्रों पर ही कुपोषित बच्चे मिले है और यही कारण रहा है कि शासन की इतनी सारी योजनाओं के बाद भी क्यों समाजसेवी संस्थानों, व्यक्तियों और समाज सेवी को आगे आना पढ़ रहा है। क्योंकि अधिकतम योजनाएं फाईलों तक सीमित होती है ।

किरायेनामें के नाम पर है फर्जीबाड़ा

विभागीय अधिकारियों द्वारा मकान मालिक और विभाग के बीच होने वाले अनुबंध में भ्रष्टचार की बू आ रही है। सूचना के अधिकार से प्राप्त जानकारी में जिन दस्तावेजों को विभाग ने सत्यापित करके दिए है उनमें अनेकों खामियां और सांठ गांठ का मामला सामने आ रहा है। यदि इन मामलों की सूक्ष्म जांच होती है तो कई मकान मालिक और अधिकारी जेल की हवा खाएंगे।

दो जगह नाम दर्ज है कई बच्चों के नाम

शहर और ग्रामीण क्षेत्रों में संचालित मिनी आंगनबाड़ी और आंगनबाड़ी में जो बच्चो के नाम दर्ज है वहीं स्कूल में दर्ज है। जिस टाईम में आंगनबाड़ी लगती है उसी समय कुछ स्कूल भी लगते है। ऐसे मेें बच्चा स्कूल में भी उपस्थित है और आंगनबाड़ी में भी तो यह तो भगवान का चमत्कार कहें या विभाग के अधिकारियों का। यह तो जांच के बाद ही पता चलेगा ।

News By: Prabhat Times

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