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दिनांक: 11-Jan-2019, Friday ,Entertainment

लघुकथा वो पतंग...

एक जनवरी रविवार का दिन सुबह नौ बजे घर की छत पर पतंग उड़ाना शुरू किया लिजु ने। पतंग हवा की ठण्डी लहरों के साथ आगे बढ़ती चली जा रही थी। आज लिजु का आत्मविश्वास और बढ़ गया, वह पतंग को ढील देकर और भी अधिक खुश हो रहा था।
पतंग भी अनन्त आकाश में उन्मुक्त रूप से लहरते हुए आगे की ओर बढ़ रही थी। अब पतंग बहुत उूर तलक जा चुकी थी और सूरज की चमक के साथ दमकते हुए हवा में लहरा रही थी। कि अनायास ही छत पर छोटी बहन छुटकी भी आ गई, लिजु ने उसे मांजा का हिचका पकड़ा कर कहा कि, तू इसे धीरे-धीरे से मैं पतंग को और ढील देता रहूंगा, तो पतंग और भी दूर तक जावेगी। छुटकी ने पहले तो मना किया, किन्तु वह मान गई। और उसने अपने दोनों हाथों से हिचका पकड़कर मांजा ढीला करती रही।
मोहल्ले पड़ोस के बच्चे भी लिजु की दूर जाती हुई पतंग को देख रहे थे। इतने में लिजु के पिताजी भी धूप सेंकने छत पर आ चुके थे। उन्होंने जैसे ही लिजु की बहुत दूर तक जा चुकी पतंग को देखा, तो खुशी में मांजा पकड़कर ठुमकी देने लगे, और पतंग भी बहुत दूर तक चल पड़ी।
अब तक लिजु की मां भी छत पर कपड़े सुखाने डालने के लिए आ गई, वह पहले तो बहुत झल्लायी, किन्तु दूर तक जाती लिजु की पतंग को देखकर प्रसन्न हो गई, और कहने लगी कि वाह, बहुत दिन बाद आज लिजु ने पतंग उड़ाई वह भी इतनी बढिय़ा, बहुत बढिय़ा।
लिजु की मां ने भी पतंग का मांजा पकड़कर थोड़ी और ठुमकी देने लगी। लिजु के माता-पिता दोनों ही एक पतंग को दूर तक जाते हुए देख रहे थे, और ठुमकी दे रहे थे। इतने में पतंग अनायास ही कहीं पर कच्चा मांजा होने के कारण टूट गई और अनन्त की ओर लहरा कर चली जा रही थी।
वो पतंग तो अब बहुत दूर तक जा चुकी थी, किन्तु उसने आज पूरे परिवार को खुशी, उत्साह व एक नई उमंग के साथ प्रेम की डोर में बांधकर अनन्त की ओर खो चुकी थी।
पतंग जा चुकी थी, किन्तु वह प्रेम के साथ रहने का संदेश दे कर गई थी और सभी को एक डोर में बांध गई थी।
अब लिजु मायुस सा शेष मांजे को हिचके में लपेट रहा था।

हरिओम दीक्षित (चैतन्य)
होशंगाबाद

News By: Prabhat Times

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